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नई दिल्ली:

सफ़दर हाशमी (Safdar Hashmi) एक नाटककार, निर्देशक, गीतकार और कलाविद थे. सफ़दर हाशमी की आज पुण्यतिथि (Safdar Hashmi Death Anniversary) है. भारत में नुक्कड़ नाटक को आगे बढ़ाने में सफ़दर हाशमी का बेहद खास योगदान रहा है. सफ़दर ने अपने नाटकों के माध्यम से शोषित और वंचित लोगों की आवाज को बुलंद किया था. सफ़दर एक संपन्न परिवार से थे, उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य से एमए कर रखा था. सेंट स्टीफ़ेंस में पढ़ाई के दौरान ही उनका जुड़ाव फेडरेशन ऑफ इंडिया की सांस्कृतिक यूनिट और इप्टा से रहा. हाशमी जन नाट्य मंच (Jana Natya Manch) के संस्थापक सदस्य थे. यह संगठन 1973 में इप्टा से अलग होकर बना, सीटू जैसे मजदूर संगठनों के साथ जनम का अभिन्न जुड़ाव रहा.

1975 में आपातकाल के लागू होने के बाद सफदर जनम के साथ नुक्कड़ नाटक करते रहे. जन नाट्य मंच ने छात्रों, महिलाओं और किसानों के आंदोलनो में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई. उनके नाटक ‘मशीन’ को दो लाख मजदूरों की विशाल सभा के सामने आयोजित किया गया. इस नाटक के द्वारा बखूबी वंचितों के शोषण को प्रभावी तरीके से पेश किया गया. सफ़दर हाशमी (Safdar Hashmi) के कुछ मशहूर नाटकों में गांव से शहर तक, हत्यारे और अपहरण भाईचारे का, तीन करोड़, औरत और डीटीसी की धांधली शामिल हैं.

”मुद्दा यह नहीं है कि नाटक कहां आयोजित किया जाए (नुक्कड़ नाटक, कला को जनता तक पंहुचाने का श्रेष्ठ माध्यम है), बल्कि मुख्य मुद्दा तो उस अवश्यंभावी और न सुलझने वाले विरोधाभास का है, जो कला के प्रति ‘व्यक्तिवादी बुर्जुवा दृष्टिकोण’ और ‘सामूहिक जनवादी दृष्टिकोण’ के बीच होता है.”

– सफदर हाशमी, अप्रैल 1983

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सफ़दर हाशमी ने बंगाल सरकार में इंफॉर्मेशन ऑफिसर के पद पर काम किया था. लेकिन 1984 में नौकरी छोड़ वह राजनीति में सक्रिय हो गए. उन्होंने नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से आम लोगों की आवाज़ बुलंद करने का उद्देश्य बना लिया.

सफ़दर हाशमी ने की कई कविताएं (Safdar Hashmi Poems) लिखीं, उनमें से एक कविता ऐसी है जो आज भी बेहद पसंद की जाती हैं.

किताबें कुछ तो कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं!

किताबें करती हैं बातें

बीते जमानों की

दुनिया की, इंसानों की

आज की कल की

एक-एक पल की.

खुशियों की, गमों की

फूलों की, बमों की

जीत की, हार की

प्यार की, मार की.

सुनोगे नहीं क्या

किताबों की बातें?

किताबें, कुछ तो कहना चाहती हैं

तुम्हारे पास रहना चाहती हैं.

किताबों में चिड़िया दीखे चहचहाती,

कि इनमें मिलें खेतियाँ लहलहाती.

किताबों में झरने मिलें गुनगुनाते,

बड़े खूब परियों के किस्से सुनाते.

किताबों में साईंस की आवाज़ है,

किताबों में रॉकेट का राज़ है.

हर इक इल्म की इनमें भरमार है,

किताबों का अपना ही संसार है.

क्या तुम इसमें जाना नहीं चाहोगे?

जो इनमें है, पाना नहीं चाहोगे?

किताबें कुछ तो कहना चाहती हैं,

तुम्हारे पास रहना चाहती हैं!

दिन दहाड़े की गई थी हत्या

एक जनवरी, 1989 को गाज़ियाबाद के साहिबाबाद में नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ के दौरान स्थानीय कांग्रेसी नेता मुकेश शर्मा ने अपने गुंडों के साथ उनके दल पर जानलेवा हमला किया था. ये घटना दिन दहाड़े हुई. हमले में बुरी तरह घायल सफ़दर की मौत 2 जनवरी 1989 को राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हुई थी. सफ़दर  के अंतिम संस्कार में 15 हजार से ज्यादा लोग सड़कों पर उतर आए थे.

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सफ़दर की हत्या करने वालों को सजा दिलाने के लिए सफ़दर के परिवार और उनके दोस्तों को 14 साल का लंबा संघर्ष करना पड़ा था. सफदर हाशमी और मजदूर राम बहादुर की हत्या के जुर्म में कांग्रेसी नेता मुकेश शर्मा और उसके नौ साथियों को आजीवन कारावास और 25-25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी.

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